Friday, 5 June 2020

कोटा व इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड-II : खुशिया सभी और

ब्लॉग का यह अंक टाउनशिप  के क्वार्टर नंबर २१  के सभी रहवासियों को समर्पित, यहाँ हम सब का बचपन बिता और आजीवन काल के लिए रिश्ते बने. यह एक बहुत ही विशेष जगह हम सभी के लिए 
सत्तर का दशक की शुरुवात बंगलादेश के जन्म से हुई और इमरजेंसी से होती हुई जनता गवर्मेन्ट पर खत्म हुई. नए नेता और नए मायने सामने आ रहे थे, आदर्शवाद अब सफारी सूट को जगह दे रहा था.  जाहिर सी बात है कोटा भी अनछुआ नहीं रहा. राजनैतिक ध्वंद में   कोटा ने जनसँग और बाद में भाजपा की और अपना रुख  मोड़ा. अब यह मत पूछिए की इन लोगो ने IL  के लिए क्या किया. १९८४, १९९८, २००९ के अलावा सभी इलेक्शन में जन संघ और फिर भाजपा का बोलबाला रहा, यह लोग तभी हारे जब लहर ही कांग्रेस की  थी. फिर कभी जब टाइम होगा तब हम सोचेंगे के इन सभी सांसदों  और पार्टयों ने IL के लिए क्या किया. क्या यह लोग बचा सकते थे IL को या और भी बहुत कुछ थे उन दिनों के कैलकुलेशन ? इस पर किसी इतिहास कार को शोध करना होगा तब शायद सच्चाई सामने आएगी I 
७० का दशक  IL के लिए  स्वर्ग सा प्रतीत होता है , न चिंता न दुःख, ये दशक IL के अविरल अनप्रस्तिस्पर्धित विकास की कहानी है. मार्किट में जितने भी थर्मल पॉवर स्टेशन, रिफाइनरी आये सभी के सभी IL के झोले में पड़े. कोई और था ही नहीं. IL  के अलावा कोटा में ज्यादा कुछ नहीं हो रहा था, या ऐसा भी कहे की हिन्दुस्तान  में कुछ नया नहीं हो रहा था. 
टाउनशिप  के सामजिक जीवन में क्लब, पिक्चर हॉल, सामुदायिक केंद्र और बास्केबॉल कोर्ट का दबदबा बढ़ता जा रहा था. तमाम पिक्चर देखने  के अलावा  बैडमिंटन और बास्केटबॉल  में रहवासियों  का इंटरेस्ट बड़  रहा था. एक के बाद एक आदमी जुड़ता जा रहा था. काफी सीरियस होता था मुकाबला और काफी रोचक भी. उच्च स्तर की प्रतिस्पर्धा का आवरण होने लगा था , ऐसा कोटा के अन्य उद्योग और समाजिक समूहों  में भी हो रहा था. (आप को जान कर ताजुब होगा की कोटा में ताँगे वालो की ब्रिज की टीम थी). हमारे  स्कूल की बास्केटबॉल टीम की झुझारू प्रत्सिपरधा रहती थी भीमगंज मंडी और मल्टी परपज  स्कूल की टीमों से. साल दर साल सभी छात्र इस मुकाबले का इन्जार करते थे. ये  बात अलग है की हम अक्सर ......... . किसी को विश्वास नहीं होगा पर बास्केटबॉल और बैडमिंटन कोटा में क्रिकेट से ज्यादा चलते थे. क्रिकेट उस समय में सिर्फ कुछ लोगो तक सीमित था , पर उन लोगो में इसको लेके  जूनून बराबर का था. ट्रांजिस्टर पर कमेंटरी और उसपर टीपणीया पान की दुकान पर सुने जा सकते थे. स्कोर पूछने और पान खाने के बीच में गुफ्तुगू क्रिकेट की होती थी. क्या गावस्कर अपने लिए खेल रहा है, क्या प्रसन्ना कुछ जादू कर  पाएगा और क्या चेतन चौहान ९९ रन के स्कोर से आगे बढ़ेगा. 
इस दौरान कोटा को दूसरा कानपूर भी कहा जाने लगा १. क्योकि कोटा कानपुर के बाद एक ओधोगिक शहर के रूप में आगे बाद रहा था और २. कानपूर की ही तरह चाकू बाज़ी भी जड़ ज़माने लगी थी.  काफी शान बड़ रही थी शहर की, पर सबसे ज्यादा बढ़  था कोटा  वासियो का खेल से प्रेम खासकर बास्केटबॉल और  बैडमिंटन के प्रति. 
1968 से ७३ तक IL क्लब में टेबल टेनिस की राज्य स्तर की चैंपियनशिप आयोजित की जाती थी, उसके बाद जिला  स्तर की प्रतियोगिताएं होने लगी. इसके बाद  कमान स्पोर्ट्स कौंसिल के हाथ  में आयी. वर्ष दर वर्ष खेलो का उन्माद  बढ़ता गया. IL  कोटा यूनिट ने  ६ बार वेस्टर्न्स जोन पब्लिक अंडरटेकिंग बैडमिंटन  चैंपियनशिप भी जीती. और फिर १९८० में  जे के लोन बैडमिंटन कोर्ट पर नार्थ जोन बैडमिंटन चैंपियनशिप का आयोजन  किया गया. देश के अवल दर्जे के खिलाडी कोटा आये जिसमे अमी घीया , सैयद मोदी. विक्रम सिंह शामिल थे. इन सबने  जबरदस्त खेल का प्रदर्शन किया और कोटा वासियों ने इस बात पर इतनी चवनिया (२५ पैसे) कोर्ट में फेकी  की एक परत जम गयी. कुछ लोगो की मेहनत से जिसमे स्वर्गीय बिर्गेडिएर निरुला (उस समय के चेयरमैन और खेल के शौक़ीन). स्वर्गीय रामभवन, स्वर्गीय खलील और मेरे पिताजी शामिल थे, से  ये सभी प्लेयर्स IL में भी खेलने आये और एक शानदार प्रदर्शन से  सबको  खुश करके गए. इन सभी लोगो को इस प्रदर्शन के लिए  १ हजार रुपया प्रति प्लेयर दिया  गया. इन सभी खिलाडियों में विशेष उल्लेख, सैयद मोदीजी का. १९८०  के बाद  सैयद ने  ५-६ साल तक नेशनल चैंपियन जीती (प्रकाश पादुकोणे के साथ मुकलबला रहता था और बाद में और भी लोग आये) और एक चूक से लंदन में आल इंग्लैंड चैंपियनशिप का फाइनल हार  गए.  यह वही सैयद मोदी जिनका लखनऊ में सनसीखेज हत्या कांड हुआ था.
 इस प्रदर्शन  मुकाबले  के बाद   IL की जनता को चस्का लगा बड़ी प्रतिस्पर्धाओ को करने  का. १९८० में शुरू  हुई  ब्रिगेडियर बी जे साहनी बास्केट बॉल (पहल राज्य स्तर  पर फिर राष्ट्रीय स्तर पर) और बहुत सारी बैडमिंटन की भारत सरकार उपक्रमों के लिए प्रतियोगीतये . ये दौर १९८० तक चला,  बहुत कहानियां है इनमे और ८० के दशक में.  अगले संकरण में विस्तार के साथ.
आप सभी का साभार, पर यहॉ पर श्री सोगानी जी का विशेष तौर पर नाम लेना चाहूंगा , उन्होने बहुत सारी जानकारी दी इस ब्लॉग को आगे बढ़ाने के लिए.
धन्यवाद

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