Monday, 16 November 2020

समय के अवशेष

 समस्त पाठको से क्षमा चाहता हू, कुछ कार्मिक प्राथमिकताओं के कारण ब्लॉग के इस अंक में बहुत देर हो गयी. 

 IL टाउनशिप के मुख्य द्वार पर एक जालियों की तात १९९० के दशक में या शयद उससे पहले लगा दी गयी थी. इसका उद्येष्य शायद जानवरो  को टाउनशिप में घुसने से रोकने का था. २००० के आते आते  इस को देख कर हसी आती थी,  जानवर तो  अंदर आ गए और आदमी बाहर निकलने  लगे. अगर आप तब तड़के बाहर निकलते तो  आपको मोर और अन्य जानवर बहुतायत में दिखाई देते थे.  स्कूटर पर सवार फैक्ट्री की और अग्रसर कोई सज्जन कभी कभार कोई दिखाई देता  था. 

२००० के आगमन  पर कोटा शहर में जबरदस्त उत्साह था, पर टाउनशिप के बाशिंदे  सुस्त नज़र आये. शायद भविष्य  के प्रति उत्साह अब कम ही हो पाता था.

कई तरह की डान क्विग्जोट वाली पुनर्चलन की योजनाए लागु की जा रही थी, पर  कुछ कर नहीं पा रही थी. टाउनशिप की जमीन, जयपुर प्लांट  का अलग होना इसी  क्विक्सोटिक प्रक्रिया का ही हिस्सा लग रहा था. IL एक के बाद एक  BIFR और अन्य कागजो में अमूल्य (काल्पनिक लोक की उपज)सुधारीकरण प्रकरण से निकल रही थी. कभी पैसे नहीं आये तो कभी आर्डर नहीं आये. बदस्तूर कंपनी के चोपड़े में लाल स्याही मढ़ती  जा रही थी. बड़ी बड़ी बाते और आश्वाशन भी मिल रहे थे. IL के लोग समय को थामना चाहते थे पर कोटा के लोगो को आगे बढ़ना था.

सन २००० के आने तक कोटा  शहर,  IIT और अन्य प्रतिस्पर्धाओ की कोचिंग का बड़ा सेन्टर बन चुका था. यह पुरे देश में बहुत तेजी से बढ़ रही सर्विस सेक्टर की क्रांति का हिंसा था.  आईटी सेक्टर के साथ अन्य सभी सर्विस सेक्टर के उद्यमी  मुस्तैदी से आगे बड़े. सरकारी आवाज उद्योग के प्रति समर्पित थी पर करती कुछ भी नहीं थी शायद यह उनके कण्ट्रोल के परे था. 

 कुछ लोगो की मेहनत रंग ला रही थी, सब की नज़र फैक्ट्री और टाउनशिप की जमीन पर थी. कैसे उससे पैसे बनाये जाए. बहुत लोग रात को इसके सपने देख रहे थे. और क्यों न सपने देखे जाये जब सामने IL की  नित कमजोर होती आभा थी. एक एक कर नए मकान  और ऑफिस IL की जमीन पर बनते रहे, किसी भी वास्तुकारी निपुणता  से बहुत ही दूर, लोगो के लिए यह मकान एक नए व्यवसाय में प्रवेश करने का जरिया बने. कितने हॉस्टल हैं इसका गिनती गिना जाना नामुकिन है, शायद हर तीसरा मकान हॉस्टल बन गया था

IL का कोटा के व्यपारिक व् सांस्कृतिक परिदान से कोई खास सम्बन्ध नहीं था इसलिए जब समस्या आयी तो किसी पर कोई असर न हुआ. IL  हमेशा से एक सुप्रिओरिटी काम्प्लेक्स  का शिकार रहा,  इस का अब उसके भविष्य पर फर्क पड़ने वाला था. मगरमछ के अलावा किसी ने भी आंसू नहीं बहाये IL की इस अवगति पर. अखबार  लिखते रहे और समझदार लोग धीरे  धीरे IL के बंद  होने की तैयारी करने लगे. आती जाती सरकारों और प्रशासन को किसी का भी प्रेशर नहीं था की कुछ काम आगे बड़े.

IL एक सहारे की तलाश में था, पर देश बदल गया था, सरकार अब पब्लिक सेक्टर से दूर भागने लगी थी. २००६ में भारत सरकार ने USA के साथ समझौता किया जिसके होने से  अब  ग्लोबल फोरम में भारत नए नजरिये से देखा जानने लगा. पर इसके पुरे इम्पैक्ट में अभी समय  था. तब तक IL ICU  में जिंदा थी. इस पर हम अगले और आखरी अंक में चर्चा करेंगे