10-07-20
ब्लॉग क यह अंक श्री मधुवन जोशी को समर्पित है, हाल ही में उनका स्वर्गवास हुआ. मेरे और बहुत से लोगो के वो क्रिकेट कोच भी थे, खेल की बारीकियों का उन्हें बहुत अच्छा ज्ञान था और सबसे बड़ी बात वो बहुत सयमशीलता से समझाते भी थे. आप में से कुछ ही लोगो को मालूम होगा की उनके नाम का एक रिकॉर्ड कोटा डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट लीग में आज भी बरकार है. यह रिकॉर्ड एक ३ दिवसीय मैच में लंच के पहले बनाया गया शतक है. ५० साल के ऊपर हो चले है पर यह रिकॉर्ड अब भी कायम है.
IL ज्वाइन करने के पहले वो क्रिकेट के राज्य स्तर पर उभरते हुए खिलाडी थे, रणजी ट्रॉफी के लिए सलेक्शन कैंप में भी बुलाये गए, पर नौकरी का पलड़ा भारी हुआ और वो कोटा आ गए. उन्होंने १९५८ में राष्ट्रीय बास्केटबॉल प्रतिस्पर्धा में भी हिस्सा लिए. उन्होंने वी पी नरूला को कोचिंग दी जो आगे जाकर बास्केटबॉल में भारत के कप्तान बने.
और भी कहानिया है जोशीजी की , बहुत से दूसरे लोगो की भी. टैलेंट तब भी था हिंदुस्तान में यह कोई नया प्रचलन नहीं है.
मई के महीने में झालावाड़ रोड पर मृगतृष्णा के अद्भुत अवतरण मिलते थे, कोई नया आदमी उस को देख कर भटक भी सकता था. शायद ८० का दशक यही सीख कर आया था, दिखता कुछ और था जबकि होता कुछ और ही. इस दशक के अंत आने तक भारत एक बहुत बड़ी करवट लेने वाला था. पर यह सब अभी दूर था और दशक की शरुआत एक बहुत ही अविश्वनीय घटना से होने वाली थी. १९८१ में सुजुकी (जापान) ने एक भारतीय कंपनी मारुती उद्योग का प्रबंध अपने हाथ में लिया और एक साल के भीतर एक छोटी कार को भारत में बना के बेचने लगे. देश के औधोयगिक विकास में यह एक बहुत बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा था. विदेशी कम्पनियो को भारत में काम करने का नया तरीका मिल गया था. हर सफल कदम की तरह इसमें भी बहुत ही सीधा हिसाब था. आप के पास मार्किट है, आपके पास कनेक्ट्स है और किसीको विदेशी कंपनी को यह दोनों चाहिए. आगे बढिये और चालू कर दीजिये. इसे जॉइंट वेंचर का नाम मिला और एक झटके में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मॉडल का स्वर्गवास हो गया. कौन करे मेहनत जब आसान रास्ता सामने था और पैसे भी बनते थे. मेहनत से टेक्नोलॉजी समझने और चीजे बनाने का जमाना गुजर गया. इसी दौर में टाटा हनीवेल (१९८७) का भी भारत में आगमन हुआ. बिरला केंट टेलर भी उसी समय शुरू हुई. आजकल टाटा समूह हनीवेल से अपना विनिवेश कर चुके है, बिरला भी ABB को कंपनी बेच चुके है. इन सब कंपनियों का कार्य क्षेत्र बहुत अलग या बहुत सिमित हो चूका है. भारत के बाजार में अब इम्पोर्ट का जमाना है. नतीजा यह है की आज पावर प्लांट्स के लिए भारत में कण्ट्रोल इंस्ट्रूमेंट बनते ही नहीं और बनते है भी तो टेंडर और सेल्स मैनेजमेंट में मात खाते रहते है. किसी को देखना होगा की १९८० में चीन में इंस्ट्रूमेंटेशन के क्या हाल थे, आज के हाल से तो हम सब जानते ही है की चीन न सिर्फ अपने लिए बनाता पर एक्सपोर्ट भी जबरदस्त करता है.
८० का दशक हिंदुस्तान में अगर सफारी सूट का दशक भी कहा जाए तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी. ऐसा क्यों? इस पोशाक की तरह भारत भी कन्फूसन में था. ना तो यह पोशाक किसीको समझ आई, ना ही उस समय के सामाजिक दाव पेच किसीको समझ में आये. हा इतना जरूर था की इस पोशाक का सबसे बड़ा ट्रेंड बेल्ल बॉटम गायब हो रहा था. पर सब बदस्तूर चल रहा था, रोज हूटर बजते थे और लोग फैक्ट्री जाते थे. हा यह जरूर था की अब दुपहिए वाहनों से जाने लगे थे, साइकिल अब जंग खाने लगी थी. सबसे बड़ी बात कार दिखने लगी थी.
८० के आते आते IL के ठाट राजसी हो चले थे, पर कोटा शहर अभी भी सीमित व्यापार और कार्यो में जुड़ा हुआ था. टाउनशिप जगमगा रही थी. और उसके चारो तरफ नयी कॉलोनियों का विकास प्रांरभ हो रहा था. सबसे पहिले आया विज्ञान नगर और उसके बाद तलवंडी, महवीर नगर. आने वाले समय में इन सब जगहों का IL से गाढ़ा रिश्ता जुड़ा.
मास्को ओलंपिक्स (जिसका अमेरिका और उसके सहयोगी देशो ने बहिस्कार किया) १९८० में हुए. अमेरिकी बहिस्कार के चलते भारत की बास्केट बॉल टीम को भी मौका मिला और इस टीम के दो लोग कोटा की बास्केट बॉल के हीरो बने. क्रमश: अजमेर सिंह एवं हनुमान सिंह राठौर का नाम राजस्थान और भारत के बास्केटबॉल इतिहास में स्वर्णित अक्षरों में लिखा जायेगा. ये दोनों कोटा की Shriram Rayons की टीम से जुड़े और लम्बे समय तक हर स्तर पर खेले.
अजमेर सिंह (६ फुट 5 इंच) एवं हनुमान सिंह ( ५ फुट कुछ इंच) एक धुरंधर जोड़ी थी, जिनको उसके बाकि सारे टीम के लोग बराबर का सहयोग देते थे. अजमेर शूटिंग करते थे और हनुमान ड्रिबल करके स्कोरिंग के मौके बनाते थे. प्रतिद्वंदी टीम के पास सिर्फ सुरक्षात्मक खेल खेलने का ही आसरा रहता था. हनुमान तकनीक से और अजमेर अपने कद से सबको छलते थे. हनुमान सिंह की एक तकनीक आज तक छाया चित्र की तरह मेरे दिमाग में छपी हुई है. कोर्ट में ड्रिबल करने और बॉल को उछलने से पहले वह एक सेकंड के लिए रुक जाते थे, इस दौरान बाकी सभी खिलाडी अपना जम्प पूरा कर लेते थे और नीचे आते हुए देखते थे की अब हनुमान ऊपर उछल रहे है. ५ फुट कुछ इंच का खिलाडी तब सभी को बहुत बड़ा लगता था. अजमेर बॉल का पास लेने को तैयार रहते और बॉल सीधे रिंग के अंदर. या फिर ३ पॉइंटर ही सही.
अजमेर सिंह ने मास्को में भी बहुत ही धुआँधार प्रदर्शन किया (टीम हलाकि सभी मैच हारी) और अपने खेल के लिए पहचाने गए. उनके आक्रामक खेल की कहानियां आप इंटरनेट पर पढ़ सकते है. अपनी हाइट का ( ६ फुट 5 इंच) का बेहतरीन उपयोग करते हुए उन्होंने अपनी टीम के लिए लीड स्कोरर का दर्जा लिया.
IL में होने वाली ब्रिगेडियर साहनी प्रतिस्पर्धा में इन दोनों का हमेशा इंतजार रहता था. इनके हर गेम में हाउस फुल होना तो लाजमी था. पर सबसे ज्यादा उत्साह रहता था इन दोनों की जुगल बंदी देखने की. जादू सा था इन दोनों का कोआर्डिनेशन. हर पॉइंट पर तालियां, हर पास पर उत्साह. कुछ लोग कहेंगे की ज्यादा हो गया पर मेरे लिए ये IPL के मुकाबले से अच्छा अनुभव है.
रयोन्स की टीम के कोच थे खुशीराम जी, जमीन से जुड़े एकदम देसी गेटअप में रहते थे. भारत के लिए उन्होंने भी खेला था. अपने समय के वे पीवेट पोजीशन के बहुत ही अच्छे खिलाडी थे, टेक्निकल और टैक्टिकल ज्ञान के भंडार. कोर्ट पर उनको देखना भी एक अनुभव था. उनकी टीम अक्सर हर साल सींग भिड़ाती थी टाटा स्टील की टीम से. टाटा की टीम में थे भारत के प्रसिद्ध खिलाडी सुनील कुमार पांडा, सिर्फ ७ फुट ३.५ इंच की हाइट वाले इस प्लेयर को लोग कौतहुल के लिए भी देखने आते थे. भाई ७ फुट जरा सोचिये, मेरे तो मन करता था की पूछ लू की ऊपर हवा कैसी है. खैर मेरी कभी इतनी हिम्मत नहीं हुई.
कौन जीता या कौन हारा ये तो मुझे याद नहीं पर है इतना जरूर था की उन १०- १५ दिन में मजा बहुत आता था. IL के कल्चर का यह एक उच्च स्तम्भ था. इसके बाद IL इसके ऊपर न जा सका.
उधर देश में सरपट परिवर्तन हो रहे थे, इंदिरा गाँधी की दिन दहाड़े हत्या कर दी गयी. राजीव गाँधी ने इलेक्शन जीता और कुछ बदलाव आये. पर जल्द ही हम सब फिर अपने नार्मल पर आ गए. तेरी मेरी चालू हो गयी और पुरे १९९० के दशक को लील गई. भारत इतना बदलेगा यह किसी बुद्धिजीवी ने भी नहीं सोचा था आम आदमी की तो बात ही क्या. IL भी अछूता नहीं था, ट्रांसफर करके लोगो को परेशान करने का सिलसिला चालू किया गया, आने वाले समय यह एक बड़ा हथियार बनने वाला था. कंपनी का काम मार्किट में रिएक्शनरी हो रहा था, कहा लीडरशिप और कहा ट्रेंड के पीछे भागना. इकॉनमी ढीली पड़ रही थी पर हम सब दूसरी चीज़ी में लगे पड़े थे. कहते है की जब आप नीचे गिरते है तो स्पीड हर पल डबल होती है. शुरू में लगता है की कुछ नहीं होगा पर और हम सभाल लेंगे, फिर आता है गुरुत्वाकर्षण का असर और सब कुछ नीचे गिरने लगता है. पहले जाता है सयम और फिर फिरता है दिमाग और फिर आता है जुगाड़. यह सब होने वाला था पर अगले दशक में.
आप सभी का साभार, हौसला बढ़ने के लिए सभी को नमस्कार.