28-08-20
८० के दशक में परिवर्तन के ट्रेलर के बाद, १९९० में असल पिक्चर चालू हुई. किसी भी हिंदी पिक्चर की तरह इसमें ऐक्शन,, इमोशंस और प्रेडिक्टेबल सस्पेंस भी था. एक के बाद एक पूर्व स्थापित मानक और सामाजिक कानून बदल रहे थे. कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता था, जिसको हाथ लगाओ वो बिदक जाता था या फिर नए समीकरण में जाने लगता था. धर्म, जाति, प्रदेश वाद सभी के नाम पर लोग आपस में लड़ रहे थे. दक्षिण में अगर LTTE अपना प्रभाव बढ़ाने की ताक में थी तो उत्तर में मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर बहस छिड़ गयी थी. जब यह सब मसले हो तो उद्योग और व्यापर का क्या काम. एक के बाद एक उद्योग बीमार हो रहे थे. कोटा में JK बंद हो गयी, OPC भी बंद हुई और अनगिनत लघु उद्योग गायब हुए.
१९९१ में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया को डॉलर की इतनी कमी आन पड़ी की देश का सोना गिरवी रखना पड़ा. काफी शर्मनाक समय था एक तरह से देश दिवालिया होने की कगार पर खड़ा था. इसी साल में राजीव गाँधी भी आतंकवाद के शिकार हुए, बड़ी क्रूरता से उनकी हत्या कर दी गयी.. देश में अराजकता और आगजनी जैसे रोज का खेल बन गए थे. पिछले दशक के दंगो से जो शरुआत हुई वो पूरी तरह से पूरे दशक में काबू न आ सके . कुछ न कुछ पूरे १० साल तक चलता रहा. १९९३ में बॉम्बे में भी दंगे हुए. इसी समय बड़े आतंकवादी हमलो की भी शुरआत हुई, बॉम्बे ने इसका बड़ा खामियाजा भुगता.
इसी दौरान एक ८० वर्षीय प्रधान मंत्री ने देश की बागडोर संभाली (स्वर्गीय पी वी नरसिम्हा राव) और एक अअभूतपूर्व दिशा परिवर्तन को हरी झंडी दिखयी. देश की राजनीति का कायवाद बदल रहा था और कांग्रेस अपनी गलतियों को और बड़ा रही थी. उन दस सालो में भारत के 5 प्रधान मंत्री बदले, जबकि उससे पहले ४५ साल में ५ लोगो का नंबर लगा. एक के बाद एक सरकार आयी और गयी.
इसी समय में कोटा में IIT कोचिंग की शिरकत हुई, JK में कार्यरत श्री बंसल ने इसकी नीव रखी, धीरे धीरे और लोग भी जुड़े. १९९५ तक यह एक बड़े उद्योग का रूप ले चूका था और बहुत सारे लोगो के लिए ये जीवन यापन का योग बना. आगे का तो हम सब जानते है.
इस दशक में सबसे ज्यादा प्रगति सुचना प्राधायगिकी और मीडिया रेवोलुशन की रही. १ से बढ़कर चैनल १०० तक पहुंचे और IT जिसको कोई पूछता नहीं था एकदम लाइमलाइट में आ गयी. दशक के अंत तक दोनों ही क्षेत्रों का दब दबा बन गया था. मीडिया का सीधा असर लोगो की जागरूकता पर पड़ा. जोर शोर से लोगो ने आगे बढ़ कर हक़ पाने और सम्मान के लिए लड़ना चालू किया. आज के राष्ट्रवाद की तरफ झुकान की भी इस दशक में नीव पड़ी.
IL के लिए समय बदल गया था, रुझान सिर्फ जुगाड़ की और था. कुछ तो चलेगा शायद यही सोच थी शायद. कभी ईधर कभी उधर पर हुआ कुछ भी नहीं. लोगो के ट्रांसफर किये गए,स्वैच्छिक रिटायरमेंट स्कीम लागू की गयी. धंधे का उसूल है की जिस दिन आप लागत सोच कर नफा नुक्सान तै करते है उस दिन से आपका पतन शुरू होता है. कोई भी उद्यम अगर अपने लोगो को भागके मुनाफे में आने की सोचता है, तो उसका हश्र तै है. ऐसा ही कुछ IL में भी हो रहा था. अग्रणी रहने के लिए सोच बदलनी चाहिए न की अपने लोग न ही अपने उसूल.
टाउनशिप का बिकना चालू हुआ , रिहैबिलिटेशन पैकेज चालू हुए. इन सबसे न किसी का आजतक भला हुआ है न कभी होगा. मैं अभी भी सोचता हू की उन दिनों किसी ने आपस में संवाद क्यों नहीं किया, कोई क्यों नहीं आगे बड़ा? और ये कहा की हम सब को करना है नाकि सिर्फ प्रभंधन को या सरकार को. अपने दायरे में सिमटे हुए लोगो ने ILको नीचे आने दिया.
ILऔर JK के बुरे दिनों में कोटा शहर के रहवासियों को कोई सहानुभूति नहीं हुई. इसका कारण सबको मालूम है पर बोलता कोई नहीं.
१९९९ में कारगिल का युद्ध हुआ , तब तक देश में नयी सोच की नीव पकड़ चुकी थी, अब सदी के पहले दशक की तयारी थी.
१९९३ मैंने कोटा छोड़ दिया, तब से आजतक शायद में २०० दिन भी कोटा नहीं रहा हूँ. इस लिहाज से मेरे अगले सब ब्लॉग दुसरो द्वारा बताये गए वृतांत आधारित होंगे या फिर अभी तक लिखी हुई किताबो का सहारा लेंगे.
इस क्रम की अभी ३ कड़िया शेष है
५) काले दिन ६) समय के अवशेस ७) IL का भविष्य
अगले महीने हम २००० से आगे की बात करेंगे, आने वाला समय IL के लिए काले दिन लाने वाला था
पड़ते रहने के लिए आपका धन्यवाद
चेतन पंड्या
P S : याद आया, पिछले कुछ दिनों में रसोड़े का किस्सा चल पड़ा है, हम सब को भी पूछना चाहिए की IL के प्रेशर कुकर से निकाल कर चने किसने रखे. ढूंढिए ज्यादातर अब भी हमारे आस पास ही हैं.